10 लाख रुपए चेक बाउंस में आरोपी बरी,,आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अरोड़ा एवं उनके सहयोगी अधिवक्ता मोहम्मद शरीफ ने की पैरवी, उधार देने की क्षमता साबित नहीं कर पाया परिवादी, परिवादी की कहानी पर अदालत को हुआ संदेह ,अदालत बोली- ऋण देने की क्षमता ही साबित नहीं हुई

पाली। लगभग आठ वर्ष पुराने 10 लाख रुपये के चर्चित चेक अनादरण प्रकरण में विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एन.आई. एक्ट प्रकरण संख्या-2) पाली की पीठासीन अधिकारी विनस चौधरी ने आरोपी प्रमोद कुमार चौरसिया निवासी सिंधी बाजार, मारवाड़ जंक्शन को आरोपों से बरी करने का आदेश पारित किया।।प्रकरण के अनुसार परिवादी गौरव मर्लेचा निवासी सुमेरपुर रोड, पाली ने न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर आरोप लगाया था कि अक्टूबर 2017 में आरोपी प्रमोद कुमार चौरसिया ने उससे 10 लाख रुपये उधार लिए थे। राशि लौटाने के लिए आरोपी द्वारा 5-5 लाख रुपये के दो चेक दिए गए, जो बैंक में प्रस्तुत करने पर “फंड्स इनसफिशिएंट” के कारण अनादृत हो गए। विधिक नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं होने पर परिवादी ने न्यायालय की शरण ली। सुनवाई के दौरान आरोपी ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उसने परिवादी से कोई ऋण नहीं लिया था। बचाव पक्ष के अनुसार गौरव मर्लेचा मारवाड़ जंक्शन में वीसी का संचालन करता था तथा उसी के संबंध में सुरक्षा के तौर पर आरोपी के पांच हस्ताक्षरित खाली चेक लिए गए थे, जिन्हें वीसी समाप्त होने के बाद भी वापस नहीं लौटाया गया। बचाव पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट अशोक अरोड़ा ने यह भी तर्क दिया कि वर्ष 2017 में परिवादी की 10 लाख रुपये उधार देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी। साथ ही आरोपी की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि उसे इतनी बड़ी राशि की आवश्यकता होती क्योंकि आरोपी पानी के कैम्पर भरकर बेचने का कार्य करता था और उसे कभी 10 लाख रुपये के ऋण की जरूरत ही नहीं पड़ी। वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अरोड़ा ने न्यायालय के समक्ष दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर यह भी दर्शाया कि 2016 में नोटबंदी के बाद वर्ष 2017 में परिवादी द्वारा 500-500 रुपये के नए नोटों में ऋण देने का दावा किया गया। इसके अतिरिक्त परिवादी द्वारा उसी अवधि में अन्य व्यक्तियों को भी 25 लाख रुपये उधार देने का दावा करते हुए उनके विरुद्ध भी चेक बाउंस के मुकदमे दायर किए गए, जिससे उसके दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न उत्पन्न हुआ। न्यायालय ने अपने निर्णय में पाया कि परिवादीगौरव मर्लेचा 10 लाख रुपये उधार देने की अपनी आर्थिक क्षमता को विश्वसनीय एवं संतोषजनक ढंग से सिद्ध नहीं कर पाया। वहीं बचाव पक्ष की जिरह एवं प्रस्तुत दस्तावेजों से परिवादी के कथनों पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ। निर्णय में न्यायालय ने माना कि आरोपी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (एन.आई. एक्ट) के अंतर्गत परिवादी के पक्ष में उपलब्ध वैधानिक उपधारणा को सफलतापूर्वक खंडित कर दिया है। परिणामस्वरूप आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त घोषित किया गया। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय चेक बाउंस मामलों में परिवादी द्वारा ऋण देने की आर्थिक क्षमता सिद्ध किए जाने की आवश्यकता को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।

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